चण्डीदत्त का जन्म 15 अगस्त 1975 ईसवी को पण्डित जानकी शरण शुक्ल के यहाँ सदर तहसील के गाँव झौहना में हुआ था। जब वे ढाई वर्ष के ही थे कि उनकी माँ की मृत्यु कैंसर बीमारी की वजह से हो गयी थी। पिताजी ने दूसरा विवाह किया, पर चण्डीदत्त पर उनका स्नेह कम नहीं हुआ। ‘कथा बिम्ब’ पत्रिका मुम्बई में मधु अरोड़ा को दिये अपने साक्षात्कार में चण्डी ने बताया-‘पिता का शरीर भले पुरुष का था पर उनका दिल माँ का था।’
पिता पण्डित जानकी शरण शुक्ल, शास्त्री महाविद्यालय गोण्डा में पुस्तकालयाध्यक्ष थे और चण्डीदत्त चार वर्ष की उम्र में ही पुस्तकों से खेलने पुस्तकालय आ गये थे। चण्डीदत्त अक्सर कहते थे- ‘मैने अक्षर ज्ञान और पुस्तकों के साथ खेलना एक साथ शुरू किया।’
पिता ने चण्डीदत्त का नाम स्कूल में लिखाया तो पर न बाप बेटे को छोड़ पाया न ही बेटा बाप को। चण्डीदत्त कहते, ‘मेरी औपचारिक शिक्षा चल रही थी जिसमें स्कूल नहीं था।’ और शायद यही कारण था कि वे पारंपरिक शिक्षा में अच्छे नहीं थे। कभी अच्छे मार्क्स नहीं ला पाये। जिसका उन्हें मलाल भी नहीं था। ‘अहा जिन्दगी’ में उनका एक जबरदस्त आलेख पढ़ा था ‘नम्बर नहीं बनाते नम्बर वन।’
पिता से उनका अतिरिक्त प्रेम था। माता, पिता, प्रेमिका उनकी कविताओं के मुख्य विषय रहे हैं। एक अबूझ, अतृप्त, रचनात्मक प्यास की क्रमिक प्रस्तुतियाँ उनकी रचनाओं में देखी जा सकती हैं।



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