उजाले बाँटते रहना / दर्द गढ़वाली

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फ़िक्र जब दिलो-दिमाग़ में शोर मचाने लगती है, तो लफ़्ज़ ख़ुद-ब-ख़ुद काग़ज़ पर उतरने लगते हैं। यह शायरी की शक्ल में ढलते हैं और फिर ग़ज़ल का लिबास पहन लेते हैं। पत्रकारिता के पेशे से जुड़ा हूँ, इसलिए सियासी और सामाजिक सरोकारों से संबंधित बातें दिल की बेचैनी को बढ़ा देती हैं। अख़बारों में ख़बरों के लिए यह बेचैनी मायने नहीं रखती। ऐसे में शायरी मुझे मेरी फ़िक्र के ज़ियादा नज़दीक लगती है। इसी के सबब काग़ज़ पर क़लम चलाने की कोशिश की और फिर टूटे-फूटे शेर कहे। यह शेर हुए भी या नहीं, यह तो आप तय करेंगे। लेकिन अपनी इसी फ़िक्र को मैंने अपने चौथे ग़ज़ल-संग्रह ‘उजाले बाँटते रहना’ में शेरों के जरिए आप हज़रात तक पहुँचाने की कोशिश की है।

– दर्द गढ़वाली

Author

दर्द गढ़वाली

Format

Paperback

ISBN

978-81-993665-8-9

Language

Hindi

Pages

160

Genre

ग़ज़ल

Publisher

Shwetwarna Prakashan

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