ग़ज़लकार ओमप्रकाश यती : एक मूल्यांकन (Gazalkar Omprakash Yati: Ek Moolyankan / Edi. Aniruddh Sinha)

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दुष्यंत कुमार के बाद जो हिन्दी ग़ज़ल की नई पीढ़ी आई उनमें ओमप्रकाश यती का नाम प्रमुखता से आता है। जहाँ तक इनके कथ्य-संसार का प्रश्न है, यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इनकी ग़ज़लों के भीतर पूरी परिपक्वता के साथ घनघोर निराशा काल में भी आशा की किरण दिखाई पड़ती है। इनकी अधिकांश ग़ज़लें नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मक दृष्टिकोण को मज़बूत करने में सफल रही हैं। सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विषमताओं के विरुद्ध संघर्ष और नवनिर्माण की आकांक्षा रक्तहीन क्रांति के द्वारा व्यक्त होती है। इनकी ग़ज़लों में वैसा विरोध नहीं है जो सिर्फ़ इन्क़लाब और ज़िंदाबाद के नारों से लिपटकर दम तोड़ दे। विरोध का यह ओढ़ा हुआ यथार्थ इनकी ग़ज़लों का स्वर नहीं है। इनकी ग़ज़लों का विरोध हमारी संवेदना की तहों में जाकर हमें बेचैन करता है और हमें देखने, समझने और सोचने की शक्ति देता है। ओमप्रकाश यती न ख़ुद तमाशा बनते हैं और न ही अपनी ग़ज़लों को तमाशे की शक्ल में प्रस्तुत करते हैं। जब लोक – संवेदना की बात आती है, इनकी ग़ज़लें दुष्यंत कुमार के ग़ज़ल-संसार से काफ़ी आगे खड़ी दिखाई पड़ती हैं। यह सच है और इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि इनकी ग़ज़लें बिना शोर मचाए और आत्म-प्रचार के भी अपना एक मज़बूत स्थान हिन्दी ग़ज़ल में रखती हैं। इन्होंने अपनी ग़ज़लों को आत्म-प्रशंसा से बचाया है। इनकी लोकप्रियता का एक यह भी कारण है।

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