हर सन्नाटा बोलेगा (Har Sannata Bolega / Edi. Shubham Shriwastava ‘Om’)

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नवगीत की साढ़े छः दशकीय रचना-यात्रा में जिन थोड़े से रचनाकारों का अलग शैल्पिक संयोजन एवं शैलीगत विशिष्टताओं के लिए स्मरण किया जाना चाहिए, सुधांशु उपाध्याय उनमें से प्रमुख हैं। उनके नवगीत न केवल नवगीत की इस संघर्ष यात्रा के सहचर रहे हैं बल्कि नवता को नये सिरे से परिभाषित भी करते हैं। नवगीत रचना की प्रचलित पद्धतियों में प्रयोग के जोखिम से न हिचकते सुधांशु उपाध्याय के नवगीत, नवगीत और नयी कविता के मध्य पुल बाँधते हैं। यही कारण है कि उनके नवगीतों का छान्दसिक-स्वरूप कभी ‘समय का छन्द’ और कभी ‘गीत-कविता’ जैसे नये संज्ञापद की माँग करता है।

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